नक़ली चेहरे

SUDHIR BAMOLA
By -
0

Fake faces, mask

मैं दूर कहीं पगडंडी पर बैठा,  

निहार रहा था क्षितिज को ।

शून्यता थी चेहरे पर उसके,

और कोई नकली भाव नही ।।



हम फिरते - रहते हैं यूँ ही ,

असली - नकली भाव लिए।

अपनेपन का अभिनय करते,

मिलने का कोई चाव नही ।।


सूरज चमके सहरा में जैसे,

भ्रमित जल आभास लिए।

सभी पथिक प्यासे ही रहते,

दूर तक कोई छांव नही।।


घूमा करते विषदन्त छुपाकर,

झूठी इक मुस्कान लिए ।

एक जगह में नहीं ये टिकते,

सर्पों के होते पाँव नहीं ।।


अमर बेल लिपटी हो जैसे,

उसका तो कोई आधार नही।

बचा करो नकली चेहरों से,


Hindi Poem, Hindi Ghazal, Best Shayari, कविता, गजल, साहित्य।


एक टिप्पणी भेजें

0 टिप्पणियाँ

एक टिप्पणी भेजें (0)
3/related/default