कहमुक़री
1 चोली
अंग अंग लिपटे तन भावे।
चोर नज़र से मुझे बचावे।
संग रहे जब करूं ठिठोली।
ऐ सखि साजन ?ना सखि चोली।।
2 काजल
नयनों में आ के बस जाए।
आ कर मोहे ख़ूब रुलाए।
अँखियन मोरी झलकाए जल।
ऐ सखि साजन ? ना सखि काजल।।
------- सुधीर बमोला----
कहमुकरी (या मुकरिया) हिंदी साहित्य की एक चुलबुली और मजेदार पहेलीनुमा काव्य-विधा है, जहाँ एक सखी अपने प्रियतम (साजन) के गुणों का वर्णन करती है, लेकिन जब दूसरी सखी पूछती है कि क्या वह 'साजन' की बात कर रही है, तो पहली सखी चतुराई से मुकर (इनकार कर) जाती है और किसी सामान्य वस्तु (जैसे चंदा, दर्जी, या चप्पल) की ओर इशारा करती है, जिसके गुण पहली सखी के साजन के गुणों से मिलते-जुलते होते हैं, जिससे काव्य-कौतुक पैदा होता है।
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