मन्जिलें

SUDHIR BAMOLA
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मन्जिलें न थीं

थीं बस राहें

बाँहे फ़ैलाए।

चलता रहा बेवज़ह

या वजह के लिए,

यूँ ही एक मोड़ पर

ठिठके कदम

पीछे मुड़कर देखा

की कहीं मिलें

दो कदम।

साथी छूटे थे

या चले थे छोड़

एक आवाज पर आने वाले

सौ आवाजों से दूर थे।

---सुधीर बमोला---

Hindi Poem, Hindi Ghazal, Best Shayari, कविता, गजल, साहित्य।

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