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मन्जिलें न थीं
थीं बस राहें
बाँहे फ़ैलाए।
चलता रहा बेवज़ह
या वजह के लिए,
यूँ ही एक मोड़ पर
ठिठके कदम
पीछे मुड़कर देखा
की कहीं मिलें
दो कदम।
साथी छूटे थे
या चले थे छोड़
एक आवाज पर आने वाले
सौ आवाजों से दूर थे।
---सुधीर बमोला---
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